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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Shrilakshman grih aaj badhaai .. | Part2-286 | श्रीलक्ष्मण गृह आज बधाई ॥
प्रकटे श्रीवललभ सुखदाई ॥१॥
धन्य धन्य माधवमास सुखकारी॥
अति फूलेश्रीगोवर्धनधारी ॥२ ॥
नामकरण ऋषि गर्ग कराये॥
श्रीलक्षमण बहु दानदिवाये ॥३ ॥।
महा महोत्सव ब्रजपुर घरघर॥ पूरणब्रह्म प्रकटे जगतीपर ॥४ ॥
वेद ध्वनी मुनि विप्र सुनाई॥ ब्रज सुंदरि हल र अति धाई ॥५ ॥
हाथन कंचन थार सुहाई॥ गावत मं गल मंदिर आंई ॥६ ॥
निरखचंद मुख नयन सिराने ॥ विविध ताप तनकेजु नसाने ॥७ ॥
घरघर मंगल चौक ' पुराये ॥ महाभाग्य निधि भूतल आये |८॥
दास निरख निरख गुण गावे ॥ मागध बंदी नोछावर पावे ॥९ ॥ | Bilawal |
Jey jan gangaa gangaa ratey.. paatak kotik janam | Part2-338 | जे जन गंगा गंगा रटे॥ पातक कोटिक जनम
जनम के ततक्षन मांझ कटे ॥१ ॥ मंजन किये होत तन निर्मल आवागमन
मिटे ॥ 'परमानँद' जल पान कीये तें बसे श्री जमुना तटे ॥२ ॥
छ राग बिभास 0 (११) जय भगीरथ नंदनी मुनि चय चकोर चंदनी नर
नाग विबुध बंदनी जय जन्हु बालिका ॥ विष्णुपद सरोज जासी ईस सीस
पर विभासि त्रिपथ गाथ पुण्य पाथ पाप छालिका ॥१ ॥ विमल विपुल
वहसि वारि सीतल त्रै ताप हारि ॥ भँवर बर बिभंग तरन रंग मालिका ॥
निज जन पूजोपहार सोभित शशि धवल धार भंजन भव भार भक्त कल्प
थालिका ॥२ ॥ निज तर बासी विहंग जलचर धिर पसु पतंग कौट जटित
ताप शशिर सरस पालिका॥ 'तुलसी' तब नीर सुमिरत रघुवंश बीर
विचरति मति मेहे गेह महिष कालिका ॥३ ॥ | Bilawal |
Madhavmas ekadashi shubhdin shrilakshaman | Part2-287 | माधवमास एकादशी शुभदिन श्रीलक्षमण
कुल आयेहो॥ नंदनंदन जासों कहियत सो द्विजवर रूप कहायेहो ॥१ ॥
बालकलीला ब्रजमें कीनी सोई आय फिरकीनेहो॥ यशुमति जोसुख
पावत सोई मात इलंमा दीनेहो ॥२ ॥ बकी विदारण तबही कीनो अबे
अविद्या गमायेहो॥ शकट विभंजन ब्रजमें कीने अब संसार नसाये
हो ॥३ ॥ तृणावर्तकों मायों तबही अब जन भ्रमण मिटायेहो ॥ नामकरण
तब ट्विजवर दीनों अबे अभय पदपायेहो ॥४॥ चोरी करि मन-हरयों जु
तबहीं अब अनन्य जन कीनेहो॥ तब कुबेर सुतकों गतिदीनी अब
विषयिनकों गति दीनेहो ॥५ ॥ तब धेनुक गर्दभही मार्यो अब माया बाद
निवायों ॥ तब काली विषधर वशकीनो अब दुर्बुद्धि प्रहायों हो ॥६॥
सखासंग ब्रज फिरे बनमें अब भवदुःख जो टार्योहो ॥ पृथ्वी परिक्रमा अब
करे प्रभु सब अनर्थकों मार्योहो ७ ॥ तब दावानल दुखहरे अब भवके
ताप नसायेहो॥ तब प्रलम्ब हत कियो दुष्टमति अब सब कपट
मिटायेहो ॥८ ॥ वेणुनाद कर तब वशकीने अब भागवत बिचारेहो ॥ तब
ब्रजभक्तनकों फलदीनों अब अन्याश्रय ते टारेहो ॥९ ॥ द्विज पलीकों लियो
तबही अन्न अब निजजनकों सुखदीयोहो | गोर्वधन तबही कर धार्यो अब
जगत उद्धारण कीयोहो ॥१० ॥ रास रसिक सुख गोपिनकों तब बहुविध
कर सुखदीनोहो ॥ भजनानंद बतायकें अब श्रुति स्मृति दृढकीनोहो ॥९ ॥
यहविध क्रीडाकरी महाप्रभु सबजन शुभपद पायोहो॥ श्रीवल्लभ पदरज
महिमाते जनगोविंद यश गायोहो ॥१२ ॥ | Bilawal |
Nand kunwar khelat radha sanga jamuna pulin saras | Part3-178 | नंद कुंवर खेलत राधा संग जमुना पुलिन सरस
रंग होरी ॥| नव घन स्याम मनोहरराजत स्यामा सुभग तन दामिनी गोरी
॥१॥ केसरि रंग कलस भरेबहु संग सखा हलधर की जोरी ॥ हाथ न
लिये कनिक पिचकाई छिरकीं ब्रज की नवल किसोरी ॥२॥| चीर अवीर
उडावत नाचत कटिसों बांधि गुलाल की झोरी ॥ मगन भई क्रीडत सब
सुंदरी प्रेम समुद्र तरंग झकोरी ॥३॥ बाजत चंग मृदंग अघोटी पटह झांड झालरि सुरधोरी ॥ तालरवाब मुरलिका बीना मधुर शब्द उच्चटत धुनि थोरी
॥8॥ अतिअनुराग बढ्यों तिहिं ओसर कुललज्या मर्यादा तोरी ॥ मदन
गुपाल लाल संग बिहरत देहदसा भूली भईबोरी ॥५॥ एक गहछत फेंटा
फगुवाकों एक करत ठाडी जुठठोरी ॥ एकजु आंखि आंजि कें भाजी एक
बिलोकि हंसी मुख मोरी ॥६॥ एकनलई छिनाय मुरलिका देति गारि मोहन
को भोरी ॥ एक फुलेल अरणजा चोवा कुंकुम रस गागरि सिर ढोरी ॥७॥
विविध भांति फूल्यो वृंदावन कूंजत कीर खट पद पिकमोरी ॥ निरखत
नेहभरी अंखियांसो योंचितबतनिस चंद चकोरी ॥ ८॥ थकेदेव किन्नर मुनिगन
सब मन मथनिज मन गयो लज्योरी ॥ परमानंददास यासुखकों जाचत विमल
मुक्ति पदछोरी ॥९॥ | Jetshri |
Harr banate baney aavat nand nandan sheesh pagaa | orey peet pichhoi roopraat | NityaPad-162 | हर बनते बने आवत नंद नंदन शीश पगा | ओरे पीत पिछोई रूपरात
जदुपति जगवंदन ॥१॥ संध्या समें ख्रिरक के द्वारे अपने अपने भाव विरारत ॥
नंददास प्रभु को मुख मिरखत त्रिविध ताप तनते सब टारत ॥ ३।। | Gori |
Houn toson abb kahaa kahon aliri kaunberki bulawat hii | NityaPad-322 | हों तोसों अब कहा कहों आलीरी कौनबेरकी बुलावत ही
तोहि ॥ नवलनागर नवलकुंज कबके निस जागतहैं प्रीतिकीतो बरही नकछू
इतनी सँकुच नाहिन तोहि ॥ १॥ कहा आयुस होतहै मोकों तुमतो सुहाग के भर
आवेश वबसोई ॥ मोहि कहा तेरोई प्राणप्रीतम सुखपावें सोईतो करोरीआली
गोविंदप्रभु अपने कंठराखति पोहि ।।२॥ | Nayaki |
Anandaki nidhi nandkumar . pragat paritrahm nutt bhesh naraakrit | Part1-043 | आनंदकी निधि नंदकुमार । प्रगट परित्रह्म नट भेष नराकृत
जगमोहन लीला अवतार ॥१॥ श्रवनन आनंद लोचन आनंद मनमें आनंद
आनंद मूर्ति | गोकुल आनंद गाइन आनंद नंद यशोदा आनंद पूर्ति ॥२॥
सब दिन आनंद धेनु चरावत बेंनु बजावत आनंदकंद | खेलत हँसत कुतूहल आनंद
राधापति वुृंदावनचंद ॥३॥ शुकमुनि आनंद भकतन निशदिन आनंद रासविलास। चरनकमल अनुराग निरंतर अति आनंद परमानंददास ॥४॥ | Sarang |
Madan gopal poojat.. | Part2-041 | मदन गोपाल पूृजत॥
बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत॥९१ ॥
कुंकुम तिलक लिलाट दियें नव वसन साज आईं गोपीजन॥
आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ॥२ ॥
आनंद मगन ग्वाल सब डोलत हीही धूमरि धौरी बुलावत॥
राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ॥३ ॥
छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग ॥
कुंभनदास प्रभु गोवर्धन धर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ॥४॥ | Sarang |
Namo shree vallabhabhadhish swami. akhand | Part2-322 | नमो श्री वललभभाधीश स्वामी। अखंड
अवतार जुगधार लीलाकरी आसुरी जीव सब मोह पामी ॥नमु० ॥ निगम
करजोर के करत स्तुति सदा सनक शुक व्यास नहीं पारपामी । शेष अज
रुद्र सुर तेंतीस ध्यावत सदा रटत हे मुनि सकल दीवस जामी ॥नमु० ॥
देखके दीनपर अतुल करुणाकरी भाग्य विधि प्रकट भये गुरुडागामी।
नंदगृह प्रकट धुत भक्त आरत हरी तेलंग कुल तिलक शिरछत्र
छामी ॥नमु० ॥ सकल सिद्धान्त नवनीतरस दैवीजन दूर किये
हृदय भ्रामी ॥नमु० ॥ कपट कली दंड सबग्रंथ खंडन किये व्यासनंदन
बचन पार ग्रामी ॥ कोटि ब्रह्माण्ड तन रोमही रोम प्रति जगत आधार धर
धीर थामो। पुष्टिपथ प्रकट कर नाम नौका करी पार संसार जे शरन
आमी। कोउ कहे विप्र कोउ विविध पंडित कहे कोड कहे अश कोउ
आत्मारामी। स्वकीयजन एक निर्धार निश्चेकये वस्तुतः कृष्णजों बंधे
दामी॥ कोन गुण कहि शके. अखिल ब्रजड़शके दीन व्हे चरनतर
शीशनामी | शरन बल्लभही भाग्य को पार नहीं भजो कृष्णदास प्रभु
अंतरजामी ॥नमु० ॥ | Kedaro |
Sevun srigiridharan chhabilo srimohanlal rangilo syaam . | Part1-065 | सेवुं श्रीगिरिधरन छबीलो श्रीमोहनल्ाल रंगीलो स्याम ।
ओर अनेक अवतार धरत हे वासों नहीं मेरे कछु काम ॥१॥ पिता नंद जाके
जननी जसोदा बड़ो वीर जाको बलराम । त्रिया जाकी वृषभाननंदनी श्रीराधा प्यारी
जाको नाम ॥२॥ जाके गिरि गोवर्धन मथुरा नगरी ब्रज बृंदावन । श्रीगोकुल
गाम मानिकचंदकों एही क्ृपाफल नित्यप्रति दरसन व्रजमें ठाम ॥३॥ | Kanharo |
Aaj atee sobhit haye nandlal. | NityaPad-255 | आज अति सोभित है नंदलाल।
कोर केसरी धोती पहरे ओर उपरना लाल ॥ १ ॥
चंदन अंग लगाय सांवरो अरु राजत बन माल॥
अति अनुराग भरी ब्रजबनिता बल बल दास गोपाल॥२॥ | Saarang |
Yaa hinn tein peeya tero naam dharyo hain dheeth .. horry | Part3-227 | या हिं तें पीय तेरो नाम धर्यो हैं ढीठ ॥ होरी
आई है मन भाई पायो जतन करि नीठ ॥१॥ मोय देखि उपहास करत
सब आईये मोहन मीत ॥ सुनों श्याम समझाई कह्ेत हों गुप्त राखीए पीति
॥२॥ कबहूं सैन दे भाजि जात हो यह जो करत अनीत ॥ जानति हों पीय
हो बहु नाईक परति नहीं परतीत ।। ३।। कबह्ूंक रवकि कंठ लपटावति कबहूंक
चलति दै पीठ ॥ श्री विद्डल गिरिधरन लाल' तुह्मे लगे न काहू की दीठि ॥४॥
| Kafi |
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