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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Yashumati jabahi kahyo nhabavanroy gayehari lotatari .. | NityaPad-153 | यशुमति जबही कह्यो न्हबावनरोय गयेहरि लोटतरी ॥
तेलउबटनोले आगेंधर लालहीचोटीपोततरी ॥१॥
मैंबलजाऊ इनमोहनकीकितरोवत बिन काजे ॥
पाछे धरराख्योचुरायके उबटनोतेलसमाजे ।। २॥
महरिबहुत बिनती कर राखतमानत नहीं कन्हाई।।
सूरस्याम अतिहीबिरुझानें सुरमुनिअंतनपाई ॥।३॥ | Devgandhar |
Baras ughar gayo meha tapakat paanti dwarum beli.. | Part2-348 | बरस उघर गयो मेहा टपकत पाँति द्वरुम बेलि॥
झमकत झार नीर भरे बूंदन सोभा देख सहेली ॥१ ॥ हों जू मनावत तूं नही
मानत प्रकटी प्रीत नवेली ॥ 'तानसेन' के प्रभु रस बस कर लीनें यातें तुम
गर्व गहेली ॥२ ॥ | Suha |
Mathatgwal haridekhi jaay || | NityaPad-183 | मथतग्वाल हरिदेखी जाय ||
गयेहते माखनकीचोरी देखतरहेनयनलजाय ॥१॥।
डोलततन सिरअचराउघर्यो बेनीपीठ डोलतमनभाय ।।
बदनडइंदु पयपान करनको मानोउरगउठ लागतपाय ॥ २॥
निरख स्याम अंगअंग प्रतिशोभा भुजभरके लीनी उरलाय ||
चितेरही युवतीहरिको मुखनयनसन देचितहिचुराय ॥ ३॥
तनमनधन गतिमतिविसराई सुखदीनों अरुमाखनखाय |।
सूरदासप्रभु रसिकशिरोमणि तुम्हारीलीलाको कहे गाय ॥।४॥। | Ramakali |
Pyaari piya khelati barr vasant .. upajati duhuun | Part3-361 | प्यारी पिय खेलति बर वसंत ॥ उपजति दुहूँ
दिस सुख अनंत ॥ध्रु० ॥ अदभुत सोभा गौर स्याम ॥ लाल पिया उर
ललित दाम ॥ उमेँगि उमँगि अँग भरति वाम | सहचरी सँग कला काम
॥१॥ सेज सुहाई अमल खेत ॥ चलत्ति कटाच्छ पिचुकि भरि हेत || सनमुख
भरि छबि छींट लेति ॥ रोम रोम आनँद देति ॥२॥| नख प्रहार छबि कनि
गुलाल ॥ राजति बिच उर ठुटी माल || जावक रँग रँँग्यौ लाल भाल ॥
पीक पलक रँँगी ललित माल ॥३॥ बाजैं ढफ भूषन सुभाई ॥ बाढ्यो सुख
कछु कहयौ न जाई | सुरति रँँग अँग छाई | 'दामोदर' हित सुरस गाई ॥४॥॥ | Basant |
Maharikahatari _ ladli kinamthansikhayo .. | NityaPad-181 | महरिकहतरी _ लाडली किनमथनसिखायो ॥
कहूंमथनीकहुँमाट हैचितकहांलगायो ॥ १॥ क्योंमेरेघर आयके तेंसबविसरायो ॥।
मथननहीं. मोहिआवही . तुमसोहदिवायो ॥२॥ . तिहिकारन
मैंआयकें तुवबबोलरखायो ॥ तबनंदघरनीमधथिदधि यह भांतबतायो ॥३॥।
हँसिबोली तबराधिका कहो अबमोहि आयो ॥ सूरनिरखमुखस्यामको
तहांध्यानलगायो ॥४॥ | Bilawal |
Bansivat baithehen nandlal .. bhayohain madhyan | NityaPad-203 | बंसीवट बैठेहें नंदलाल ॥ भयोहैं मध्यान
छाककी बिरियां अपनी अपनी गैया छैया लेआवो व्रजबाल ॥।१॥।
ग्वालमंडलीम ध्यविराजत करत परस्पर भोजन नवत्न बने गोपाल ॥।
आसकरण प्रभु मोहनमागर सबसुखरसिक रसाल ॥२॥ | Saarang |
Prohit vrishabhaanu kau hoe aayou nandrai darbar ..|dhru0.. | Part3-088 | प्रोहित वृषभानु कौ हो आयौ नंदराई दरबार ॥|ध्रु०॥
सिंघ पौरि खेलैं ब्रजबाला छिरकति कुँमकुम नीर ॥ ब्रज की बीथिनि खेल
मच्यौ हो भई परसपर भीर || १॥ घरि लयौ बाश्नन चहेँ दिस तें लीने बसन
उत्तारि॥ नेन आँज कें दयौ दिठौंना बैंनी गुही संबारि ॥|२॥ तन सुख चीर,
लाह को लहिंगा, अँगिया बनी कटाब ॥ कंठ पोति, कर पौहोंची सोहे,
बाजू बंद जड़ाव ॥३॥ तिया-भेष अद्भुत जु बन्यौ है कट्दति सबैं ब्रज-
नारि ॥ दै पटतार नचावें पांड़े, गावति हैं मिलि गारि ॥७॥ उत तें आवति
हैं नैंद-नंदन, गोप सखा सँग जोरि ॥ प्रोहित की गति देखि साँवरो हँसति,
मुक्ति मुख-मोरि ॥५॥ तब मोहन जुवतिन मधि आए पांडे दियो छुड़ार्ई ॥
फणुवा बहुत मँगाई सबन कौं देति है हरखि बुलाई ॥६॥ देति असीस चलीं
ब्रज-बनिता, चिर जियौ ब्रजराई ॥ जाके राज सदाँ इह्ि बिधि सौं, खेलति
है हम आई ॥७॥ तिहिं औसर पांड़े कों दीने, नौतन बसन मँगाई चल्यों
बहुरि वृषभान पुरा को फूल्यों अंग न माई ॥८॥ ब्रह्मादिक, सनकादिक,
नारद, रहे बिमानन छाई ॥ यह छबि निरखि बारि तन, मन, धन, 'विष्नुदास!
बलि जाई ॥%॥ | Kafi |
Atee vipareet trinaavart aayou . baat chakr miss vraj upar dey | Part1-170 | अति विपरीत तृणावर्त आयौ । बात चक्र मिस ब्रज उपर दे
नैंदपौरीके भीतर धायौ ॥१॥ पौढ़े श्याम अकेले आँगन लेत उड़यौ आकास
चढ़ायौ । अँधाबुँध भयौ सब गोकुल जो रह्यौ सो तहाँ छिपायो ॥२॥ जसुमति
आई थाई जो देखे श्याम श्याम कही शोर लगायौ । धावहु नंद गुहार लगौ किन
तेरी सुत अँधबाइ उड़ायौ ॥३॥ इहि अंतर आकासतें आवत परवत सम कही
सबही बतायौ । मास्यौ असुर शिलासों पटक्यौ आपु चढ़े ता उपर भायौ ॥४॥
दौरे नंद जसोदा दौरी तुरतहि लेतही कंठ लगायौ | सूरदास यह कही जसोदा ना
जॉनों बिधिनहिं कहा भायौ ॥५॥ | Suho |
Aaj uthh bhor navkunj kaanan sakhee thhaadi bhaee radhika rangbhini .. | NityaPad-136 | आज उठ भोर नवकुंज कानन सखी ठाडी भई राधिका रंगभीनी ।।
बिलस सुख संग नवरंग पिय स्थामघन कामकी सेन सब जीतलीनी ॥ १॥। सुभग
विकसत बदन नथन अति रसमसे मोर मुखहास कछु सकुच कीनी ॥। श्रीविद्डल
गिरिधरन संग नागरी जाग सबरेन आनंद दीनी ॥॥२॥। | Khat |
Mandal madhi bundavan nrityat mohan kunj bihaari .. nupur dhuni | Pustak1-348 | मंडल मधि बुंदावन नृत्यत मोहन कुंज बिहारी ॥ नूपुर धुनि
सुनि मोहे बाजत मृदंग द्वुम बेली प्रफुल्लित शरद चंद उजियारी ॥१॥ कान्ह
कुँवर हितकारी सुनि वृषभान दुलारी चलि राधे हा हा री तू प्रा ननतैं प्यारी ॥
कूल प्रभु प्यारी छिन नहीं होत न्यारी कह्मौ मानि मेरौ नटनागर सों पग
धारी ॥२॥ | Adano |
Jhoolat phool bhaee atee bhaari .. nirmit varr | Part3-377 | झूलत फूल भई अति भारी ॥ निर्मित वर
हिंडोल विटप तरु बृंदा विपिन विहारी ॥१॥ सरंत्री सकल अति मुद्दित भई
हैं पहरें विविध रंग सारी ॥ भुकुटी भृंण लावण्य अंग अंग प्रति कोटि मदन
छबि टारी ॥२॥ वरणन करिये कहा प्रेम को रूचिदायक तहां गारी ॥ व्यास
स्वामिनी की छबि निरखत प्राण संपदावारी ॥३॥ | Basant |
Udayo bhaanu bhootal twizrai .. | Part2-270 | उदयो भानु भूतल ट्विजराई ॥
मिटगयो तिमिर पाखंड कर्म पथ पुष्टिभक्ति प्रकटाई ॥१ ॥
बदि बैशाख पवित्र एकादसी श्रीलक्ष्मषण गृह सुखदाई॥
जयजयकार भयो बिभुवनमें कुसुमन वृष्टिकराई ॥२ ॥
नवसत साज सुंदरि सब आंईं हरखित मं ॥
ध्वजा पताका तोरण द्वारें मोतिन चौक पुराये ॥३॥
पूरे सकल मनोरथ जियके उर आनंद न समाई॥
यह लीला कहांलों बरणों निरख दास बलजाई ॥४॥ | Devgandhar |
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